शनिवार, 24 जनवरी 2026

सुख की खेती [ आलेख ]

 048/2026

               

©लेखक

डॉ०भगवत स्वरूप 'शुभम्'

यहाँ प्रत्येक नर -नारी सुख की खेती कर रहा है। सुख की फसलें उगा रहा है।उन फसलों पर सुख के फूल और फलों का लाभ उठाता हुआ आनंदित भी हो  रहा है।परंतु न जाने इन सुख की फसलों के बीच दुःखों के झाड़ -झंखाड़  कहाँ से और कैसे उग ही आते हैं। इसका पता उसे तब लगता है जब वे उसे कष्ट देने लगते हैं और सुख की फसलों के लिए बाधा बन जाते हैं। यदि इसके मूल में जाकर देखा जाए तो पता लगता है कि बिना बोए हुए झाड़-झंखाड़ों के ये बिरवे कहाँ से पनप गए। जिस प्रकार किसान के द्वारा बीज बोते समय कुछ ऐसे बीज उसकी दृष्टि को नजरंदाज करते हुए आ ही जाते हैं,जिनकी छँटनी बारीकी से नहीं की गई होती है।परिणाम यह होता है कि वे फसल के साथ ही उगते और पनपते रहते हैं ।यदि समय रहते उन्हें काटकर विनष्ट नहीं किया जाता तो वे किसान और मूल फसल के लिए भी घातक बन जाते हैं।स्वामी की लापरवाही और दूरदृष्टि का अभाव उसकी फसल को चौपट करने में कोई कोर कसर बाकी नहीं छोड़ता।

ऐसी स्थिति में क्या करणीय है?यह एक जटिल प्रश्न बनकर उभरता है। इसके समाधान के लिए प्रथमतः तो यह आवश्यक है कि स्वामी में पूर्व नियोजन की क्षमता होनी चाहिए। उसमें दूरदर्शिता होनी चाहिए। पूर्व नियोजन और उसकी दूरदर्शिता का अभाव उसकी फसल को चौपट कर देता है। केवल पैसा ही सब कुछ नहीं है। जहाँ पैसा काम नहीं आता,वहाँ उसका मष्तिकीय नियोजन अधिक उपयोगी सिद्ध होता है।एक अनुभवी कृषक या स्वामी इस प्रकार की असावधानियाँ  नहीं करता। और उसकी फसल में कम से कम झाड़- झंखाड़ उगते हैं,जिनके विनष्टीकरण का उपाय भी वह सहज ही कर सकता है।

मानव जीवन में सुख के साथ दुःख भी अनिवार्य हैं। इन दोनों का समन्वित नाम ही जीवन है। अब बात मात्र इतनी है कि इन दुःख के काँटों का निराकरण कौन किस प्रकार करता है।प्रत्येक व्यक्ति की जीवन जीने और कार्य करने की शैली अलग-अलग प्रकार की होती है। इस शैली की नकल नहीं की जा सकती। प्रत्येक व्यक्ति की स्थितियाँ और परिस्थितियां अलग- अलग होती हैं।ऐसी स्थिति में सबका जीवन भी अलग -अलग प्रकार से चलता है। यह अनुकरणीय नहीं है।इसमें उसकी परिवारिक आर्थिक सामाजिक भौगोलिक और पारिस्थितिक स्थितियाँ बदलती रहती हैं,जो उसकी सुख की खेती को प्रभावित करती हैं। बिना किसी पूर्व योजना और दूरंदेशी के सब काम खराब हो जाता है। लोग समझते हैं कि उनके पास पैसे की कोई कमी नहीं है, इसलिए उनका कुछ भी अशुभ नहीं हो सकता। यह उनके चिंतन की एक बहुत बड़ी भूल है।पैसा एक साधन हो सकता है,भगवान नहीं हो सकता। किसी कार्य की सफलता के लिए बुद्धि चातुर्य भी अनिवार्य है।जो सबके पास नहीं होता। प्रायः धनिक लोग समझते हैं कि वे बुद्धि के भगवान हैं,उन्हें कहीं कोई रुकावट नहीं आ सकती। यह उनकी सबसे बड़ी भूल है।

आदमी जल्दी से जल्दी धनी बनना चाहता है। और इस प्रयास में वह अपने चारों ओर मकड़ी का ऐसा जाल बना लेता है,जिसमें वह स्वयं ही उलटा टंग जाता है।कार्याधिक्य भी फसल में झंखाड़ों को उगने के लिए आमंत्रण है। इसके लिए व्यवस्थित प्रबंधन का होना अति अनिवार्य है। यदि समुचित प्रबंधन नहीं तो किसी छोटे से छोटे कार्य में सफलता मिलना भी संदिग्ध है।

पशु हो या पक्षी, कीट पतंगा हो या मनुष्य :सभी सुखाकांक्षी हैं।सबके सुख अलग- अलग प्रकार के हैं।अपनी ही सीमा का अतिक्रमण भी दुःखों को आहूत करने के समान है। 'जब आवे संतोष धन ,सब धन धूरि समान ' -कथन के अनुसार किसी सुख की कोई सीमा नहीं है। जब फसल उगेगी तो खर पतवार उगना भी अनिवार्य है। बस उनका निस्तारण कैसे करना है;यह सीखना भी जरूरी है।अगर यह नहीं आया तो एक दिन पूरे खेत में खर पतवार और झाड़ -झंखाड़ ही

खड़े मिलेंगे,फसल तो उजड़ ही जाएगी। वनैले जानवरों और चिड़ियों से सुरक्षा भी खेत स्वामी का दायित्व है।इसको  नजरंदाज नहीं किया जा सकता।खूब सुख की फसल लगाइए ,किन्तु उसका समुचित नियोजन और श्रेष्ठ प्रबंधन भी उसकी सुरक्षा के लिए अनिवार्य है। बया पक्षी अपने श्रेष्ठ प्रबंधन और श्रम से अपने सुंदर और सुडौल नीड़ में निवास करता है और कौवा इतना कुशल प्रबंधन अनिभिज्ञ है कि सही घोंसला भी नहीं बना पाता ,तो उस प्रकार से सूखी जीवन जिएगा भी तो कैसे !आदमी को भी बया पक्षी की तरह नियोजक और कुशल प्रबंधक होना चाहिए । फिर देखिए उसकी खेती में झाड़ -झंखाड़ कैसे फसल को बरबाद करते हैं ?

शुभमस्तु ,

24.01.2026◆12.00 मध्याह्न

                ◆◆◆

जीवन है अनमोल [ कुंडलिया ]

 047/2026


        


©शब्दकार

डॉ.भगवत स्वरूप 'शुभम्'


                         -1-

मानव  तन अनमोल  है,रखना  इसका ध्यान।

पुष्ट  रखें हर   अंग  को,चंद्रहास   ज्यों म्यान।।

चंद्रहास   ज्यों    म्यान,देह   के  अंग सँजोएँ।

ऑंख नाक  मुख दंत,नित्य सद जल से धोएँ।।

'शुभम्'  करें मत पान,सुरा का बनकर दानव।

तन   जीवन   की  खान,सहेजे ही  हर मानव।।


                         -2-

मानव जीवन  धन्य  है,मिला  तुम्हें नर गात।

सदा समझ अनमोल ये, तुच्छ नहीं ये बात।।

तुच्छ नहीं  ये बात, इतर  पशु खग से न्यारा।

नहीं कीट या भेक, नहीं  सरिता की   धारा।।

'शुभम्' लगा  ले बाँध,नहीं  रहना बन दानव।

प्रतिपल    इसे  सँवार, बने  रहना है मानव।।


                         -3-

अपना  चरित   सँवारिये,चरित बड़ा  अनमोल।

बद  करनी   इस  देह   की,देती  है  विष घोल।।

देती    है  विष    घोल,  दाग  जीवन  में लगता।

मिले  जहाँ  भी  पोल,  वहाँ सद्गुण कब उगता।।

'शुभम्' चरित ही सत्य, न  समझें इसको सपना।

समझ  मूढ़ नर तथ्य,कनक -सा जीवन अपना।।


                         -4-

मानव  जीवन   के लिए,ज्ञान   बड़ा अनमोल।

सभी  बड़ों  से   लीजिए,मिले जहाँ अनतोल।।

मिले   जहाँ  अनतोल,  विश्व शिक्षालय सारा।

पंच  तत्त्व  खग   वृक्ष,सभी   ने   ज्ञान सँवारा।

'शुभम्'  बने  सत पात्र,  नहीं करना कोरा रव।

मौन गगन   के  सूर्य,  चाँद   से  सीखे मानव।।


                         -5-

पानी    व्यर्थ  न   कीजिए, पानी  है अनमोल।

कम से कम  में काम   ले,बहा   नहीं अनतोल।।

बहा नहीं  अनतोल,  एक  दिन  प्यासा मरना।

नहीं   रहे  कुछ  हाथ,पड़े जब तुझे बिफरना।।

'शुभम्'   न   उगना  अन्न,  मरेगी   तेरी नानी।

बूँद - बूँद  अनमोल,अमिय  यह निर्मल पानी।।


शुभमस्तु !


23.01.2026◆9.15 आ०मा०

                    ◆◆◆

जिह्वाएँ नर-मादा होतीं! [ नवगीत ]

 046/2026


          

 ©शब्दकार

डॉ.भगवत स्वरूप 'शुभम्'


जिह्वाएँ 

नर-मादा होतीं

यह इतिहासी तथ्य नहीं है।


घर के अंदर

बाहर देखो

अद्भुत दिखें नमूने हैं

जीभ नहीं

रुकती नारी की

उठते बड़े   बगूले  हैं

अवसर पाकर

पुरुष बोलता

बात सत्य यह सभी कहीं है।


गतिरोधक 

मादा जिह्वा का

भूल गया नारी निर्माता

नॉन स्टॉप ही

चलना उसको

बता गए हैं विश्व विधाता

रोना-गाना

मिला साथ में

युद्धों की पटभूमि यहीं है।


स्वतः चलित

चुम्बक फिट मुख में

ब्रेक नहीं गतिरोध नहीं

कितना कुछ भी

कहे जीभ से

बदकथनी  का बोध नहीं

आँसू का हथियार 

न रुकता

पुरुषों के मुख जमा दही है।


शुभमस्तु !


22.01.2026◆3.00प०मा०

                 ◆◆◆

उत्तरी ध्रुव दक्षिणी ध्रुव [ अतुकांतिका ]

 045/2026


      

©शब्दकार

डॉ.भगवत स्वरूप 'शुभम्


उनकी जुबान में

कोई और ही

मशीन लगी है, 

चलते -चलते

थकती ही नहीं है,

कभी भी 

दो महिलाएँ

चुप नहीं बैठ सकतीं,

यह प्राकृतिक चमत्कार है

बिना रेगुलेटर के

पंखे की तरह स्वतंत्र।


कितना स्वार्थी है

ये 'पुरुष'  नामक जीव

बिना मतलब के

नहीं बोलता,

चार आदमी

अपरिचित बैठे हों

उनकी जीभ का

कोना भी नहीं हिलता,

पता नहीं 

इस अनायास

 मौन धारण में

उन्हें क्या मिलता,

सही कहा है:

सदैव सदा 

'सद्गुण' का फूल

सर्वत्र नहीं खिलता,

बिना ऑन ऑफ का

टीवी सबको नहीं मिलता।


और कुछ नहीं तो

चुगलियाँ ही सही,

सास ने दूसरी सास से

बहू ने मोहल्ले की

दूसरी बहू से कही,

सबसे रसदार है 

ये  चुगली-चर्चा

दो कौड़ी का भी

इसमें लगता नहीं खर्चा,

रस ही रस है यहाँ

किसी को 

लगती नहीं मिर्चा।


कुदरत ने 

दो विरोधाभासों को

मिलाया है,

पहले तो थे वे दोनों दोपाये

अब चौपाया बनाया है।


इतिहास गवाह है कि

आज तक किसी को

अच्छी बहू नहीं मिली,

और किसी भी बहू को

सास भली नहीं मिली,

और ये पुरुष भी

अजीब है कि

कभी सास बहुओं की

चर्चा तक नहीं करता,

बुराई तो क्या 

खाकर करेगा !

करेगा भी तो 

अपने किए का भरेगा।


इधर उत्तरी ध्रुव है

तो उधर दक्षिणी ध्रुव,

दोनों मिलते हैं

पर अपने ही ढंग से,

बाद में

उत्तर उत्तर 

और दक्षिण दक्षिण

एक उत्तर तो

एक सदा ही प्रश्न,

प्रतिप्रश्न,

पर कीजिए भी क्या

किए हुए हैं

परस्पर संलग्न।


शुभमस्तु !


22.01.2026◆2.15प०मा०

                ◆◆◆

अंबर नीला सागर नीला [ नवगीत ]

 044/2026


  


©शब्दकार

डॉ.भगवत स्वरूप 'शुभम्'


अंबर नीला

सागर नीला

धरा धरातल धूसर-धूसर।


नीले ने

व्यापकता बो दी

सारा जगत समाया है

दृष्टि पड़े जो

दृग अंचल की

तृप्त भाव भर आया है

भू पर 

हरे पेड़ लतिकाएँ

कहीं पड़े हैं सूखे ऊसर।


अंबर मौन

मौन ही सागर

कभी-कभी करता गर्जन

मौन पड़ी

सहती सब धरती

कभी नहीं करती वर्जन

सहनशीलता की

वह शिक्षक

और नहीं ऐसा दूसर।


रंग-रंग के

दृश्य धरा पर

नील गगन में शशि तारे

दिनकर करे

उजाला दिन में

जाग्रति के  गूँजें  नारे

सागर के तल में

मुक्तामणि

चमक बिखेरें निज ऊजर।


शुभमस्तु !


22.01.2026◆11.45 आ०मा०

                   ◆◆◆

मादक मृदुल बहार [ सोरठा ]

 043/2026


     

©शब्दकार

डॉ.भगवत स्वरूप 'शुभम्'


आने      लगी   बहार,पौष-माघ   जाने   लगे।

 कोमल     रश्मि   उदार,  सूर्यदेव बरसा रहे।।

कोयल के मधु  बोल, खिलतीं  कलियाँ बाग   में।

 रँगरलियां    रस   घोल,   बरसें   नई बहार की।।


  मादक मृदुल बहार, सरसों   फूली  खेत    में।

 सुमन    स्रवित  रसदार,भ्रमरावलि गुंजारती।।

नव    पाटल     के  फूल, क्यारी  में गेंदा खिले।

कलियाँ शाख  बबूल, खिलतीं नवल बहार की।।


 यौवन    एक   बहार,  मानव   जीवन के लिए।

खुलें  प्रगति  के द्वार, उर में  खिलते फूल - से।।

उठता   उर उल्लास, जब   बहार   हैं झूमतीं।

चमके  नवल    उजास,जीवन   में  आंनद  हो।।


ज्यों कोकिल के बोल,  निर्मल  विरुद बहार का।

तन -मन में   रस  घोल,  कुहू - कुहू अंतर करे।।

आती    सघन   बहार,   षोडशियों  की   देह में।

बहे   रसों   की   धार,  अंग- अंग    नित झूमता।।


कलियाँ   करें  पुकार,   आता  है मधुमास जब।

भरती   विमल  बहार,कण- कण में नव   चेतना।

टर्र -टर्र      उच्चार, पावस   ऋतु  जब आ   गई।

छाने लगी बहार,    करते    मेढक   ताल   में।।


वन-वन    फूले   ढाक,  फागुन   की रंगीनियाँ।

भ्रमर   रहे    हैं ताक,  है बहार - गरिमा बड़ी ।।


शुभमस्तु !


21.01.2026◆ 7.15 प०मा०

                   ◆◆◆

आने लगी बहार [ दोहा ]

 042/2026


 


©शब्दकार

डॉ.भगवत स्वरूप 'शुभम्'


पौष-माघ      जाने     लगे, आने  लगी बहार।

सूर्य  देव   बरसा    रहे, कोमल   रश्मि उदार।।

खिलतीं कलियाँ बाग में,कोयल के मधु   बोल।

बरसें   नई  बहार   की, रँगरलियां    रस घोल।।


सरसों   फूली   खेत  में,  मादक   मृदुल बहार।

भ्रमरावलि   गुंजारती,   सुमन    स्रवित रसदार।।

क्यारी   में  गेंदा    खिले, नव  पाटल  के  फूल।

खिलतीं  नवल बहार की,कलियाँ शाख  बबूल।।


मानव   जीवन   के    लिए, यौवन  एक बहार।

उर में  खिलते   फूल-से,खुलें  प्रगति  के  द्वार।।

जब   बहार   हैं   झूमतीं,  उठता  उर उल्लास।

जीवन  में  आनंद   हो, चमके   नवल उजास।।


निर्मल विरुद  बहार का, ज्यों कोकिल  के  बोल।

कुहू-कुहू   अंतर  करे,  तन-मन  में   रस घोल।।

षोडशियों    की   देह में,  आती  सघन बहार।

अंग-अंग    नित  झूमता, बहे  रसों की धार।।


आता   है  मधुमास जब, कलियाँ  करें पुकार।

कण-कण में  नवचेतना,  भरती विमल बहार।।

पावस   ऋतु   जब  आ गई,  टर्र-टर्र  उच्चार।

करते  मेढक   ताल   में,  छाने   लगी बहार।।


फागुन   की  रंगीनियाँ, वन-वन  फूले ढाक।

हैं    बहार-गरिमा  बड़ी, भ्रमर  रहे  हैं ताक।।


शुभमस्तु !


21.01.2026◆7.15प०मा०

                  ◆◆◆

किनारे पर खड़ा दरख़्त

मेरे सामने नदी बह रही है, बहते -बहते कुछ कह रही है, कभी कलकल कभी हलचल कभी समतल प्रवाह , कभी सूखी हुई आह, नदी में चल रह...